2 Inch Hila is a satirical take on the grueling reality of daily commutes, crumbling infrastructure, and the never-ending traffic jams we face. From the mismanagement of road repairs to the loss of patience in gridlock, this poem reflects the voice of every taxpayer stuck on the road.
If you've ever felt like your life is moving just "2 inches" at a time in traffic, this one is for you -- 2 Inch Hila -- YouTube weblink
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शीर्षक: 2 इंच हिला, 2 इंच हिला, फिर 2 इंच हिला
ट्रैफिक जैम में घंटों फँसकर माथा हुआ मेरा ढीला,
रेंगती गाड़ियाँ देख के मेरा पेशेंस हूआ पलीता,
क्लच, गियर, ब्रेक और एक्सेलरेटर के खेल से हाथ‑पाँव पड़े नीला,
2 इंच हिला, 2 इंच हिला, फिर 2 इंच हिला।
मरम्मत के नाम पर ठेकेदार ने जमकर पैसा पीला,
आज खोदा, कल भरा, परसों वही खेल दोहराया,
जनता के टैक्स का हिसाब गुम, बस धूल ही धूल उड़ाया।
2 इंच
हिला,
2 इंच
हिला,
फिर
2 इंच
हिला
।।
१
।।
पानी की पाइप बिछी तो बिजली वालों ने रास्ता छिला,
सड़क बनी तो अगले हफ़्ते फिर से खोद दी गई,
योजना अधूरी, जनता की उम्मीदें रोज़ तोड़ी गई।
2 इंच
हिला,
2 इंच
हिला,
फिर
2 इंच
हिला
।।
२
।।
विकास के वादे सुन‑सुनकर कानों में छाले चढ़े,
मुंबई की रफ़्तार अब रेंगती है कछुए जैसी,
सपनों की नगरी में सफ़र बन गया है एक मौत जैसी।
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